महुआ की सुगंध

बिन बताये अंदर आ जाता है,
पहले बीज सा, फ़िर वृहद हो जाता है ।
कमरे में उग गया हो जैसे बरगद कोई,
घाने के गुड़ सा गाढ़ा होता है वो प्रेम।

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मैं हर रोज़ इक दौड़ में हिस्सा लेता हूँ,

दौड़ ,

वक़्त के साथ…. जीतता हूँ अगर,

तो रात में भूख दरवाज़े नहीं ठक-ठकाती,

थक जाता हूँ , अक्सर…

इसलिए आज बादलों से रुई उधार लेकर फुरसत की तकिया सिरहाने लगा ली है।

सोचा , दो मिनट घड़ी से चुराकर ,   चैन से बिता ही लेता हूँ…

फ़िर कहाँ!

वैसे भी ज़िन्दगी असमंजस में शामें काटती है

इन दिनों ,

इन दिनों , मेरी ज़रूरतों और मेरी ख्वाहिशों , की आपस में बनती नहीं ।

photography : akshat pathak