कमरा

image by Akshat 

खिड़की से कुछ दूर एक कुर्सी बैठी हुयी थी ,

और पास ही एक आदमी खड़ा था ।

सामने, टेबल पर एक कलम लेटी थी उसके बाजु diary  का एक पन्ना ऊँघते हुए करवट बदल रहा था या शायद हवा से फड़फड़ा रहा था ।

वो आदमी हमेशा  से ऐसे खूँटे से बँधा था जो दिखता नहीं था ।

सन्न सन्नाटा । चुप सी चीख़ें ।कमरे में पसरा पड़ा कत्थई  भारी शून्य …

अचानक तेज़ रोशनी का एक झरना खिड़की से बहता हुआ अंदर आया,उसमें सब कुछ भीग गया ।

भीगा ऐसे की किसी सामान को निचोड़ो तो उसे टपके प्रकाश की कुछ बूँदें ।

कमरे में सबकुछ वैसा हो था ,सिवाए उस आदमी के  जो अब वहाँ नहीं था ।

कलम जस की तस रखी थी , फिर धीरे से  पन्ने पे कुछ लिखावट दिखी ।

सन्न सन्नाटा। फड़ फड़फ़ाहट। दीवार पे लटकती उजली चादर।कमरे में पसरे कत्थई शून्य के बाजु लेटने की जगह बनाती साएँ साएँ,हवा की आवाज़… 

क्या वो आदमी शब्द होकर एक लम्बी कविता बन गया था ,

या एक विचार बन कर खिड़की से उड़ गया था ।


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