महुआ की सुगंध

 

 

बिन बताये अंदर आ जाता है

पहले बीज सा, फ़िर  वृहद हो जाता है ।

कमरे में उग गया हो जैसे बरगद कोई

घाने के गुड़ सा गाढ़ा होता है वो प्रेम ।

aks

 

रास्ते सारे, पीले सूखे पत्तों से ढके थे। गाँव, गर्मियों में रात के अलावा कभी शान्त नहीं रहते।  जो लिख कर बताई ना जा सके ऐसी आवाज़ लिए गरम हवाएँ सिर्फ सुन पाने वाली आवाज़ करते हुए दोपहर भर घूमते रहती हैं और सबसे ज्यादा शोर, छाँव में लेटी दोपहर की झपकी के कानों  में करती हैं।

ऐसी ही एक दोपहर, एक झपकी थकी हारी सी छाँव में  लेटी ही थी की गरम हवाओं की, वही आवाज़ जिसे लिखना कठिन है, पर सुनना आसान, जो साँय -साँय से कुछ ज़्यादा और किसी खोखले सिलिंडर के कान पे रखते ही सुनाई देने वाली फु… से थोड़ी कम, इन्ही दोनों के बीच कहीं होती है। वही आवाज़ पत्तो पर किसी के चप्पल  रखने और किसी के नंगे पाँव चलने  की आवाज़ के साथ मिलकर झपकी के कानों में उतर आयी। महुआ के फ़ूल टोकनी में कोई आवाज़ नहीं कर रहे थे, इनके कोई आवाज़ न करने से सन्नाटे का शोर बढ़ा होगा शायद।

अधखुली सी अलसायी आँखें , सुनती हैं की ..

– “महुआ ओ, महुआ ”

– “हम्म ?”

-“तेरा नाम महुआ काहे है वो?”

-” काहे है मतलब ! तेरा काहे टोकनी है? ”

-“अरे का बतायेँ …..छोड़ तू  ,बड़ी फनी कहानी है।”

– “ बता न तो …”

-“अम्म्म.. अरे जब हम हुए न तो , अम्मा मर गयी। दाई ने पकड़ के एको  टोकनी में लिटा  दिया, हम  उसी में पड़े रहते  थे । उके उप्पर ही एक तार बाँध के झुन-झुना भी टाँगा था । अब जब भी कोई टोकनी से हमको उठाता तो हम रोते, और जैसे ही वापस रखता हम चुप हो जाते, तो बापू बोले  की ये टोकनी माँ की गोद है, बस सब टोकनी टोकनी ही बोलने लग गए हमको …”

– “इसमें का फनी है रे , तेरा नाम बस फनी है , बापू सही बोले  थे तेरे  शायद।”

– “हो.. ,अब तू बता !”

-“अरे….मेरे  नाम का तो सच में फनी है !”

-“हैं !”

– “हाँ तो, वो जो दाई है न, वो जिस के नाक में दोनों तरफ मस्सा है, नथनी जैसा चिपका है ?”

– “वो!  बेवड़ी  है वो अम्मा तोह ..”

– “हाँ वोई रे ,तो हम भी पैदा हुए वो हमको जैसे ही गोद में ली और बोल पड़ी की ये तो महुआ सी महकती है , सब       हंस पड़े और महुआ  महुआ ही बोलने लग गए !”

– “वो तो  धुत्त  रही होगी कच्ची पीके, सबै महुआ महकता है फिर। पर …तू सही में  महुआ सी महकती  है रे ..”

– “धत्त!”

– “अरे सच्ची ..अभी जब तू थक के सो गयी थी न  तब हम भी वही  बाजू आकर लेट गए थे, तो  तेरी गर्दन पे छोटी सी  एक पीली तितली बैठी थी । हम  उड़ाने को हाथ बढ़ाये तो एकदम महुआ महका तेरी गर्दन से।”

उम्र की पहली शर्माहट लजा कर  बोली  “चुप्प ”

कमरे के अंदर पता नहीं कहाँ से एक बीज उग आया , और अगले ही क्षण पौधा उगने को था।

– “अरे , भगवान् कसम ..”

– “जभी बहुत सारी तितली , मेरे पेट पे आ के बैठी फिर लगा की अंदर ही  चली गयी और अंदर ही उड़ने लगी ”    महुआ बोली ।

अंदर का पौधा सवाल किया  “तू जाग रही थी ?”

झुकी गर्दन से निकली हल्की गुलाबी धीमी आवाज़ बोली – “हओ!”

पौधे की चमड़ी तो धूप से नहाई चुकी थी पर चमड़ी के अंदर धूप अब जाकर उतरी थी और सब सहसा कुन-कुना  हो गया ।

– “तो फ़िर सोने का नाटक काहे कर रही थी ?”

महुआ की आँखें एक पल को टोकनी से टकराई और फ़िर कहीं नीचे पत्तो में झाँकने लगी , गुलाबी अब हल्के से गाढ़ा हो गया ।

– “ऐसे ही….”

–  “मेरे पेट पे तो झाड़ से धड़ाम कर के एक गिलहरी कूदी थी।”

झपकी अब एकदम जाग चुकी थी, तपती धूप में जो झाड़ थे, झाड़ के जो सायें थे उनमें एक अद्भुद ऊर्जा और प्रेम का फौव्वारा  फूटा था , बूंदों में जिसकी खिल खिलाती हंसी थी .  दोपहर की झपकी ओझल होने को थी , जाते जाते शायद आती हुई  लाल शाम को ये कहानी बता दे !

                                                              हँसते हँसते, कुछ महुआ के फूल  टोकनी की एक उखड़ी हुई सीक के साथ फंस कर  नीचे गिर गए और सूखे पत्तों  में कहीं जगह ढूंढ ली। दो चप्पल और नंगे पाँव धीरे धीरे दूर जाने लगे, झपकी तरो ताज़ा सी उठ कर दूसरी दिशा में बढ़ते हुए ओझल होने को थी। आवाज़ें काफी दूर जा चुकी थी।

                                                                    और फ़िर  वही, लिख कर न बताए जा सकने वाली  हवाओं की आवाज़ें खाली जगह को भरने लगी थी। हालाकि अब हवाओं में थोड़ी ठंडक  घुल गयी थी । उस जगह से दूर जाने वालों की दिशा  नीचे पत्तो में कहीं ,सीक में फ़से  महुआ के फूल तय कर रहे थे, और फ़ूलों में शब्द फ़से हुए थे।

 

बरगद तोड़ कमरे को , पार हो जाता है, 

नभ में कहीं खो जाता है।

पक्षी आशियाना ढूंढ ही लेते है खोह में कहीं ।

गुड़ की मिठास बढ़ते ही जाती है ,

कुछ भी ऐसा हो तो वोह प्रेम ही हो सकता है।

 

 

 

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