“हमसफरनामा”

तू जब जब रौशनी में भीगती है ,मैं खुरदुरी सतह पर तेरी परछाईं रहा हूँ..

वक़्त के कागज़ पर खुशनुमा नज़्म हुई तू जो , मैं उसी पन्ने पर बेतरतीब सी फैली नीली गाढ़ी स्याही रहा हूँ

निशब्द हुई जब जिस पल , मैं उस खाली कमरे में बिखरी ख़ामोशी रहा हूँ…
और वो मुस्कुराहटें …

जब कोई मांद पड़ चुका पत्ता , शाख से टूट कर , किसी शांत झील के सोये पानी पर आ ठहरता हो , और एक शर्मायी सी तरंग उठ कर कहीं आगे आकर गुम हो जाती है जैसे ,

मैं उन्ही मुस्कुराहटों के पीछे की कोई न कोई वजह रहा हूँ ।
बरसों बीत गए, पर फ़िर भी सब नया सा है जैसे,एक अंतहीन यात्रा पर हैं हम दोनों

तू एक राही है इस हमसफरनामें में ,

मैं ओझल सा ही सही, तेरे साथ-साथ था मगर, तू जिस पे चल सके मैं वो सड़क रहा हूँ
मैं  तेरे एक पूरे का ,आधा हिस्सा रहा हूँ ।
मैं जानता हूँ की मैं तेरे होने की कोई न कोई वजह रहा हूँ।

photography :akshat pathak

#kahani _wala

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