धूप जैसे बाहर की इन दीवारों को ही छूकर चली जाती है

और यह जर्जर दीवारें जैसे मेरे अस्तित्व का पर्याय हैं ।

इन से मुझे  अब कोई उम्मीद नहीं जैसे रिश्तों से नहीं ।

नीला आकाश ओढ़े बैठी हूँ,  अकेले, समय काटते …

नहीं , किसी का इन्तज़ार नहीं , बस बैठी हूँ।

ज़रूरी नहीं,  हर कहानी  का अन्त अच्छा ही हो

कभी कभी  किरदार खुद ही समझौते कर , कहानी को यूँ ही खत्म कर देते हैं ।

पर खुद खत्म नहीं होते

वे हमारे अवचेतन में जीते हैं।

photography :akshat pathak

#kahaniwala

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s