मैं हर रोज़ इक दौड़ में हिस्सा लेता हूँ,

दौड़ ,

वक़्त के साथ…. जीतता हूँ अगर,

तो रात में भूख दरवाज़े नहीं ठक-ठकाती,

थक जाता हूँ , अक्सर…

इसलिए आज बादलों से रुई उधार लेकर फुरसत की तकिया सिरहाने लगा ली है।

सोचा , दो मिनट घड़ी से चुराकर ,   चैन से बिता ही लेता हूँ…

फ़िर कहाँ!

वैसे भी ज़िन्दगी असमंजस में शामें काटती है

इन दिनों ,

इन दिनों , मेरी ज़रूरतों और मेरी ख्वाहिशों , की आपस में बनती नहीं ।

photography : akshat pathak

धूप जैसे बाहर की इन दीवारों को ही छूकर चली जाती है और यह जर्जर दीवारें जैसे मेरे अस्तित्व का पर्याय हैं । इन से मुझे  अब… Read more